(“माँ” — एक ऐसा नाम जो पुकार नहीं, एक पूरी चेतना है।
यह कविता एक बेटे की आत्मस्वीकृति है, जिसमें माँ की उपेक्षा नहीं, माँ को ‘सिर्फ माँ’ मान लेने की भूल का पछतावा है।
यह उन सबके लिए है जो माँ के रहते व्यस्त रहे, और अब जब वह नहीं हैं, तो शून्यता में उसे ढूँढ़ते हैं।)
जब तू थी,
तो तुझसे शिकायतें थीं—
कभी खाने को लेकर,
कभी पहनावे को लेकर,
कभी मेरी अनिच्छा के बावजूद
मुझसे कुछ करवाने के लिए,
और कभी बस यूँ ही,
बिना वजह…
अक्सर मैंने तुम्हारी चुप्पी को
अपनी उपेक्षा मान लिया,
तेरी थकान को आलस,
और तेरी चिंता को रोक-टोक।
तब भी तेरी उपस्थिति
मेरे लिए उतनी ही स्वाभाविक थी
जितनी नींद में आती साँसें—
जरूरी, पर अनदेखी।
अब जब तू नहीं है,
तो हर दीवार से स्वर उभरते हैं,
और वो अदृश्य कवच
जो मेरे इर्द-गिर्द हर घड़ी मौजूद था,
वह चुपचाप चला गया है।
तेरा जाना
जैसे आत्मा पर एक मौन आघात था—
तू गई,
बिना कुछ कहे, बिना कुछ लिए।
माँ,
अब समझता हूँ—
तू केवल एक व्यक्ति नहीं थी,
तू एक संस्था थी,
एक निर्लिप्त सूर्य,
जो बस जलता रहा,
सबको उजाला देता रहा,
पर कभी स्वयं को विश्राम नहीं दिया।
अब तेरी अनुपस्थिति
हर उस क्षण में गूंजती है,
जो कभी तुझसे भरा था—
पलकों के कोनों में,
भाषा की चुप्पियों में,
और उन प्रश्नों में
जिनका कोई उत्तर नहीं होता।
माँ,
काश मैंने वो पल
तेरे पास बैठकर बिताए होते—
जब तू मौन होकर
मेरे पास थी।
काश मैंने तुझे
सिर्फ माँ नहीं,
एक थक चुकी मनुष्य भी समझा होता।
अब समझ में आता है—
माँ के रहते जो समय
हम सोचकर नहीं बिताते,
वो उनके जाने के बाद
पछतावे की तरह
हर स्मृति में चुभता है।
आज,
मेरे किए गए तमाम
अक्षम्य अपराधों के बावजूद,
तेरा दिया हुआ प्रेम
एक गुप्त मंत्र की तरह
मेरे भीतर गूंजता है—
अदृश्य, लेकिन अनवरत।
और वो सुरक्षा कवच
जिसके खो जाने का मैं
इतना यकीन कर बैठा था—
वो अब भी
निस्संदेह मुझे घेरे हुए है।