माँ की स्मृति

आज  १७ अप्रैल को मेरी पूज्या माँ की ११वीं पुण्यतिथि है। उनके प्रति अपने हृदय के भावों को शब्दों में बाँधना शायद असंभव है—और यदि असंभव नहीं, तो दुष्कर तो अवश्य है। जिस ममता और प्रेम ने हमारे जीवन को आकार दिया, हमारे अस्तित्व को परिभाषित किया, उसे केवल स्मृतियों में समेट पाना सम्भव नहीं है । फिर भी एक प्रयास करने का मन होता है—यह जानते हुए भी कि ऐसी कोई भी कोशिश केवल एक अधूरी प्रार्थना ही होगी, आभार की एक केवल एक विलंबित और असफल अनुभूति।

अपने पाँच भाइयों में शायद मैंने बचपन का सबसे कम समय माँ के साथ बिताया। लगभग ११ वर्ष की आयु में मैं पढ़ाई के लिए घर से बाहर चला गया। इसके बाद, विश्वविद्यालय की शिक्षा और फिर भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन के कारण मेरा जीवन घर से दूर-दूर ही बीता। इस कारण माँ के सान्निध्य की  मेरी स्मृतियाँ सीमित है, परंतु वे भले ही सीमित हों, पर वे हैं अत्यंत गहन और मूल्यवान, क्योंकि वे अंतरतम तक व्याप्त हैं और उनमें अंतर्निहित भावलोक पूर्णतः मेरा निजी है।

मेरे मन में माँ की जो छवि अंकित है, वह सघन स्नेह और मूक ममता की है। क्योंकि १०-११ वर्ष की उम्र तक तो माताएँ अपने बच्चों को कम ही डाँटती हैं—और मुझे स्मरण नहीं कि माँ ने मुझे कभी डाँटा हो। मेरा सान्निध्य भले ही अल्प रहा, पर जब भी मैं छुट्टियों में घर आता, वह समय एक विशुद्ध आनंद बन जाता। माँ मेरी पसंद के व्यंजन बनातीं और ज़ोर देकर खिलातीं—वह प्रेम का एक ऐसा उत्सव होता, जिसमें कोई औपचारिकता नहीं होती—केवल वात्सल्य की निश्छल सहजता होती।

माँ को अपने बच्चों में दोष दिखाई ही कहाँ देते हैं? और यदि कोई अन्य कुछ कह दे, तो जैसे माँ अपने भीतर एक अभेद्य दीवार खड़ी कर लेती हैं। मेरी माँ भी हम भाइयों में कोई खोट नहीं देख पाती थीं—गलती यदि होती भी थी, तो वह किसी और की ही होती थी।

ऐसे कई दृश्य हैं, जो स्मृति-पटल पर अमिट रूप से अंकित हैं। मेरे बड़े भैया हम सबमें सबसे मेधावी थे—और उतने ही शरारती भी। एक बार उन्होंने लकड़ी से धनुष और तीखे बाण बनाए—खिलौना कहिए, पर उसका असर असली जैसा ही था। वे कभी हमें डराते, कभी मोहल्ले के बच्चों पर अपनी ‘वीरता’ आज़माते।

एक शाम पड़ोस की एक लड़की से कुछ कहासुनी हो गई। दोनों बच्चे ही थे, हलकी झड़प स्वाभाविक थी। पर भैया का ग़ुस्सा तेज था—उन्होंने आव देखा न ताव, धनुष उठाया और बाण छोड़ दिया। इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते, तीखा बाण जाकर उस लड़की की दाहिनी आँख के ठीक ऊपर जा धँसा।

इसके बाद जो हुआ, वह मोहल्ले के इतिहास में एक अलग अध्याय बन गया—लड़की की माँ और पड़ोसी दौड़े चले आए। आवाज़ें ऊँची होती गईं, तकरार का ताप बढ़ता गया। पर माँ अडिग थीं—उन्हें अपने बेटे की कोई भूल नज़र नहीं आई। उन्हें दोष दिखा, तो उस लड़की का या उस माहौल का, जिसने भैया को ऐसा करने पर विवश किया।

हमारे लिए यह एक सामान्य बाल-उल्लास का क्षण था, पर माँ की वह अटूट पक्षधरता आज भी भीतर कुछ हिला देती है। एक निष्पक्ष दर्शक को जहाँ भैया की गलती साफ़ दिखती थी, वहीं माँ को वही दृश्य जैसे उल्टा प्रतीत होता था—जैसे सच्चाई का कोई और ही कोण उनके भीतर प्रतिध्वनित हो रहा हो।

माएँ सचमुच भिन्न होती हैं—दुनिया से भी, न्याय की सीमाओं से भी ऊपर—अपने बच्चों के लिए असीम और कभी-कभी अंधी करुणा का जीवंत रूप।

दशकों बाद, जब माँ स्वयं अशक्त हो गई थीं और चल-फिर नहीं पाती थीं, तब भी जब मैं उनसे मिलने जाता, वे अपनी सारी पीड़ा को भूलकर रसोई में जातीं और मेरी पसंद की कोई न कोई चीज़ अवश्य बनातीं। वह क्षण इतना मर्मस्पर्शी होता कि उसकी स्मृति मात्र से आत्मा भीग उठती है। उनका वह आग्रह—”कुछ तो बना ही देती हूँ”—उस अवस्था में भी, उनके भीतर प्रेम की पराकाष्ठा था। जब मैं उनके हाथ की बनी खीर या पराठा, या पकौड़े खा रहा होता, वह क्षण मेरे जीवन के सबसे सुखद और पवित्र अनुभवों में से एक होता। 

पर इस प्रेम की गहराई को समझने और उसका प्रत्युत्तर देने में मैं चूक गया। मैं अपनी माँ के साथ वह समय नहीं बिता सका, जो मुझे बिताना चाहिए था। उनके लिए कुछ कर सकने के अवसर मेरे जीवन में कम आए, और जो आए, उन्हें मैंने पूरी तरह जिया नहीं। यह केवल चूक नहीं—एक अपराध है—एक ऐसा अपराध जिसका दंड मुझे स्वयं को देना है। मैं कुछ भी कर लूँ, यह अपराध-बोध मुझसे कभी विलग नहीं होगा।

माँ अन्य भाइयों की तुलना में मेरे पास बहुत कम समय रहीं। उन्हें हमारे पैतृक स्थान से विशेष लगाव था—जहाँ उनके परिचित लोग थे, और उनके अपने भाव सहज रूप से संप्रेषित हो सकते थे। जीवन के उत्तरार्ध में जब संवाद और संगति की आवश्यकता बढ़ती है, तब ऐसी जगह उनका रहना स्वाभाविक था।

मेरे छोटे भाई अनिल ने माँ की सबसे अधिक सेवा की—बहुत श्रद्धा और समर्पण से। मैं उसके प्रति कृतज्ञ भी हूँ और स्पृहावान भी। माँ के प्रति उसके प्रेम और सेवा का कुछ अंश यदि मेरे हिस्से में भी आया होता, तो शायद मेरा अपराधबोध थोड़ा कम हो जाता।

आज जब मेरी अपनी आयु सत्तर पार कर चुकी है, और शरीर में क्षीणता का अनुभव प्रतिदिन होता है, तब यह ग्लानि और भी अधिक भारी हो जाती है। जीवन की सांध्यवेला में खड़ा मैं, माँ की स्मृति के समक्ष नतमस्तक हूँ—और मौन क्षमा माँगता हूँ। यह जानते हुए भी कि क्षमा माँगने का समय निकल चुका है, फिर भी एक पुत्र की आस्था यही कहती है कि वे जहाँ भी हों, अपने उसी ममतामयी हृदय से मुझे क्षमा कर देंगी।

उनके अंतिम वर्षों की छवि मेरी स्मृति में स्थायी रूप से अंकित है। वे पूर्णतः बिस्तर पर आश्रित हो चुकी थीं। शरीर ने साथ छोड़ दिया था, और स्मृति भी धीरे-धीरे भ्रमित होने लगी थी। उनकी आँखों में एक अनकही व्यथा थी—जैसे जीवन से उनका नाता धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा हो।

मेरी उनसे अंतिम मुलाक़ात उनके अवसान से कुछ माह पूर्व हुई थी। उन्होंने कुछ कहा नहीं, पर उनकी मौन दृष्टि ने बहुत कुछ कह दिया था। ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे भीतर से कुछ अप्रसन्न थीं—जैसे कोई बात उन्हें गहरे तक पीड़ा पहुँचा रही हो। उन्होंने कोई शिकायत नहीं की, पर एक पुत्र के लिए माँ की मौन वेदना को समझना कठिन नहीं होता।

मैं उस क्षण में उनके और अधिक निकट नहीं जा सका। मैं उनके मन की पूरी बात जान नहीं सका। आज यह सोचकर हृदय व्यथा से भर जाता है कि कहीं वे किसी गूढ़ पीड़ा के साथ इस संसार से विदा हो गईं? —और हम  उन्हें उस दुःख से मुक्त नहीं कर सके। यह एक बोझ है, जो मेरे अंतर्मन को अनवरत त्रास देता रहता है—एक मौन सिसकी की तरह।

आपका दिया हुआ जीवन, आपका दिया हुआ संस्कार—सब कुछ आज भी मेरे साथ है। आपने कभी कुछ नहीं माँगा—केवल दिया। आज मैं जो कुछ भी हूँ, उसमें आपका मौन योगदान सबसे बड़ा है। मेरी स्मृतियों में आपकी छवि आज भी उतनी ही उज्ज्वल, उतनी ही स्पष्ट है—जैसे तब थी, जब बचपने में स्नेह और आग्रह से हमें दुलारती थी, खिलाती थीं। हमारी हर मुश्किल का समाधान रहता था उनके पास।

मुझे अपनी भूलों का गहरा एहसास है, लेकिन उन्हें सुधारने का अवसर मैं गँवा चुका हूँ। अब मैं क्या माँग सकता हूँ—सिर्फ यही कि माँ, आप अपने मौन आशीर्वाद से मेरी इन भूलों को ढँक दें। माएँ जीवन भर देती रहती हैं—और कभी कुछ भी वापस नहीं माँगतीं। और आप तो एक असाधारण माँ थीं।

जो नहीं कहाजो नहीं लिखा
वही तो माँ है
मौन में प्रार्थनाअश्रु में आशीष।

आपकी स्मृति को मेरा सादर, साभार, प्रणाम।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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