(यह रचना एक व्यक्तिगत स्मृति से जन्मी अवश्य है, पर इसका संदेश सार्वजनिक है।
गौरैया को बचाना केवल एक पक्षी को लौटाना नहीं है,
बल्कि एक पूरे मनोविज्ञान, एक जीवनशैली, और एक सांस्कृतिक आत्मा की पुनर्स्थापना है।)
“दादू, गौरैया कैसी होती है?”
उसने पूछा—एक मासूम प्रश्न, पर उसके भीतर एक युग के विस्मृत हो जाने की गूंज थी।
मैं ठिठक गया। कुछ क्षणों को जैसे समय ने पकड़ लिया—जैसे किसी धुंधलाए आईने में अतीत की एक झलक उभर आई हो।
मैंने उसे अपने पास बैठाया और खिड़की की ओर देखने लगा—वहीं, जहाँ कभी गौरैया बैठा करती थी।
अब वहाँ बस काँच के परदे हैं, एल्युमिनियम की फ्रेमें हैं, और है एक निर्वाक खामोशी।
गौरैया—एक साधारण-सी दिखने वाली चिड़िया, पर हमारी जीवन-संस्कृति की एक सहज उपस्थिति। वह न तो मोर की तरह आकर्षक थी, न हंस की तरह आभिजात्य। पर उसमें था एक आत्मीय सौंदर्य—जैसे मिट्टी की सौंधी गंध, जैसे दुपहरी की नर्म धूप, जैसे रसोई की खिड़की पर चुपके से झाँकती कोई पुरानी याद।
“अब वह नहीं आती, दादू?”
उसने फिर पूछा।
मैंने धीरे-से उत्तर दिया, “नहीं बेटा, अब नहीं आती।” उस उत्तर में पीड़ा थी—प्रश्नों से ज़्यादा आत्मस्वीकृति की पीड़ा।
हमने उसे जाने दिया। बिना रोके, बिना चेताए। हमने उसके बसेरे छीने—पेड़ काट डाले, छतें सील कर दीं, बालकनियों को प्लास्टिक की बेलों और काँच की दीवारों से भर दिया। मोबाइल टॉवरों की तरंगों ने उसके रास्ते भटका दिए, और कीटनाशकों ने उसके भोजन को ज़हर बना डाला। शहर की चकाचौंध में उसकी आवाज़ें खो गईं—चुपचाप, जैसे कोई पुराना दोस्त बिना विदाई के चला जाए।
पर बताओ, क्या गौरैया कोई विलासिता थी? क्या वह केवल बच्चों की कविता या सजीव मनोरंजन थी? नहीं। वह तो हमारी चेतना की एक कड़ी थी—नाज़ुक पर आवश्यक।एक सूचक थी, एक दर्पण—जो हमें हमारे वातावरण से जोड़ता था, हमारे भीतर के स्वाभाविक, संवेदनशील मनुष्य को जगाता था।
वैज्ञानिक कहते हैं, पिछले कुछ दशकों में गौरैया की संख्या में तेज़ी से गिरावट आई है।शहरी इलाकों में तो उसकी उपस्थिति अब अपवाद बन चुकी है।जिस गौरैया के बिना बचपन की कल्पना अधूरी थी, वह अब केवल स्मृति बन कर रह गई है।
लेकिन यह केवल एक चिड़िया के विलुप्त होने की कहानी नहीं है।यह हमारे भीतर की संवेदनाओं के संकुचित होने की भी दास्तान है। हमने तकनीक के ऊँचे शिखर छुए, पर अपने भीतर की हरियाली को बंजर कर दिया।
“क्या वह लौटेगी, दादू?”
उसने फिर धीमे से पूछा।
मैं उसके बालों पर हाथ फेरते हुए चुप रहा।
क्योंकि यह प्रश्न गौरैया से कहीं बड़ा था। यह हम सबके लिए था—क्या हम फिर कभी इतने सहज, इतने सजग, इतने सजीव हो पाएँगे कि एक गौरैया हम पर भरोसा करे?
शायद!
यदि हम फिर से पेड़ लगाएँ, छतों पर पानी रखें, बालकनी में कुछ दाने बिखेरें। यदि हम अपने घरों को फिर से इतना खुला बनाएं कि कोई छोटा परिंदा उसमें आश्रय पा सके। यदि हम फिर से अपने मन को वह ऊष्मा दें जिसमें जीवन की हर छोटी उपस्थिति फल-फूल सके।
उस दिन मेरी पोती ने मुस्कराते हुए कहा—“मैं कल से छत पर पानी रखूँगी।”
मैंने उसकी आँखों में आशा की एक झलक देखी—नन्ही पर निश्चल। शायद यह वही बीज है—संवेदनशीलता का, स्मृति का, और पुनर्प्रार्थना का।
और मैंने मन ही मन पूछा—
क्या तुम लौटोगी, गौरैया?
क्या फिर तुम हम पर विश्वास करोगी?
क्या हमारे घर, हमारे मन फिर से उतने खुले, उतने ऊष्मावान हो पाएँगे?