कब लौटोगी , गौरैया?

यह कविता एक मासूम प्रश्न से उपजी। मेरी छह वर्षीया पौत्री  ने मुझसे पूछा, “दादू, गौरैया क्या होती है?” उस क्षण लगा जैसे किसी भूली हुई दुनिया ने धीरे से दस्तक दी हो। गौरैया केवल एक पक्षी नहीं थी; वह हमारे बचपन, हमारे प्रांगणों, और हमारे सह-अस्तित्व की एक जीवंत प्रतीक थी।

आज जब वे हमारे आसपास नहीं हैं, तो उनकी अनुपस्थिति मात्र  पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक रिक्तता का एहसास  भी है। यह कविता उसी रिक्तता, उसी स्मृति, की, और एक आंदोलित करने वाले आत्मचिंतन की प्रतिध्वनि है। यह केवल गौरैया की नहीं, बल्कि उन मूल्यों की खोज है जिन्हें हम आधुनिकता की दौड़ में कहीं पीछे छोड़ आए हैं—संवेदनशीलता, धैर्य, मासूमियत, और जीवन  की छोटी-छोटी ख़ुशियाँ।

यह रचना स्मरण भी है, पछतावा भी, और कहीं न कहीं एक कोमल आशा भी—कि शायद, एक दिन, वे फिर लौट आयेंगी?



"दादू, गौरैया क्या होती है?
क्या आप मुझे एक दिखा सकते हो?"
मेरी छह साल की पोती का मासूम सवाल
हवा में तैरता है —
एक भूले-बिसरे गीत की तरह
जिसे मैं कभी गुनगुनाया करता था।

वो समय अब स्मृति है,
जब गौरैया हर कहीं दिखती थीं —
खिड़कियों पर फुदकतीं ,
छतों पर चहकतीं ,
सुबह की रोशनी में अपनी नन्ही बोलियों से
हमारे दिन की शुरुआत करतीं।

घरों की दीवारों में बने उनके छोटे घोंसले,
उनका निस्संकोच आना-जाना,
एक निश्छल, सहजीवी जीवन का प्रतीक था —
जिस पर कभी किसी ने प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया।
अब वे दृश्य कहीं खो गए हैं।

गौरैया कहाँ चली गईं?
क्या वो हवा के साथ चली गईं —
जो अब आँगनों में बहती नहीं?
या कंक्रीट के जंगलों में घुल गईं
जहाँ प्रकृति के लिए कोई कोना नहीं बचा?

क्या खेतों में छिपा ज़हर
या मशीनों की क्रूर गड़गड़ाहट
उनके गीतों को चुप कर गई?

हम कभी खिड़कियों पर रोटी के टुकड़े रखा करते थे,
और इंतज़ार करते थे —
उन पंखों की हल्की फड़फड़ाहट का,
उनके आने की नन्ही सी आहट का।
अब एक चुप्पी है
जिसे मैं क्या नाम दूँ?

पर क्या हमने केवल गौरैया ही खोई है?
या उनके साथ कुछ मूल्य, कुछ रिश्ते,
कुछ मासूमियतें भी पीछे छूट गईं हैं ?
हम समय की रफ्तार में आगे बढ़ गए —
और वो, शायद, पीछे रह गईं।

एक दिन, शायद,
गौरैया फिर लौट आएँगी —
जब कोई दरवाज़ा खुला रह जाएगा,
कोई खिड़की अधखुली होगी,
और हमारी दुनिया
थोड़ी संवेदनशील हो गई होगी।
उनकी नन्ही चहचहाहट
फिर से जीवन की गुनगुनाहट बन जाएगी।

लेकिन मुझे कोई बताए —
क्या जो मूल्य हमने खो दिए हैं
वे भी लौट पाएँगे?
धैर्य, दयालुता, और
छोटी-छोटी बातों में मिलने वाली निष्पाप खुशियाँ?

मैं अपनी पोती का हाथ थामता हूँ,
और धीरे से कहता हूँ —
"शायद, मेरी गुड़िया,
अगर हम दिल की सुनें,
और थोड़ा रुकना सीखें —
तो गौरैया भी लौट सकती हैं,
और वे सब चीज़ें भी
जिन्हें हमने कहीं पीछे छोड़ दिया है।"

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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