क्षमता का एहसास

(ईश्वर द्वारा प्रदत्त क्षमताओं का ज्ञान और उसका एहसास आसानी से नहीं होता। लेकिन अगर हो जाए तो उनका पूर्ण एवं सम्यक् उपयोग हमारा दायित्व है। किंतु हमने अपनी क्षमताओं का सदुपयोग किया या नहीं, इसकी समझ तो जीवन की समाप्ति पर ही हो पाती है। और अगर लगे कि हमने अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं किया तो फिर हमें क्या करना चाहिए?)

मैं भगवान के सामने खड़ा था 

सिर झुकाए, दिल में उम्मीदें जगाये 

सांस रोके  प्रतीक्षा कर रहा था 

अपने जीवन का निर्णय सुन रहा था।

हाँ! तुमने कई अच्छे काम किए है 

दूसरों की मदद की है, और 

तुम दयालु भी थे 

और तुमने कभी-कभार ही पाप किया है 

और निस्वार्थ रूप से अपने परिवार और 

दोस्तों से प्यार किया है

मैं तुमको नियुक्त करने को इच्छुक हूँ 

स्वर्ग के लिए !

लेकिन एक छोटा सा सवाल 

मुझे परेशान करता है 

जो मुझे तुमसे पूछना चाहिए 

तुमने और अधिक करने से अपने आप को रोका क्यों?

भ्रमित और अवाक्, मैं थोड़ी देर चुप रहा   

फिर स्मृति की परतें हटाई 

सच में, अपनी क्षमताओं के अनुरूप नहीं जी पाया था मैं  

बेहतर होने के कई मौक़े भी गँवाये थे 

फिर उसने सौम्यता से पूछा 

यह प्रश्न,

स्वर्ग या पृथ्वी पर वापसी ?

मैं मूक , चकित, स्तंभित था 

मैं आपसे पूछता हूँ 

क्या पृथ्वी पर वापस आना 

अधिक सम्माननीय है? 

अधूरे  कार्यों को पूरा करने के लिए 

या, बुद्धिमानी होगी इसमें 

कि  स्वर्ग के अद्भुत आनंद के 

उपभोग के लिए  

मैं हामी भर दूँ! 

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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