वसंत का क्या करूँ?

ज्वर के ताप से मैं बिस्तर पर पड़ा हुआ हूँ, और इधर वसंत है जो बाहर लहलहा रहा है। अधख़ुली शीशे की खिड़की से दिखता है मंजरिओं से लदा हुआ आम। एक सुंदरी की सुकुमार और कमनीय उँगलियों की तरह इसकी पीत -हरित बौरों की अवलि  झूमती ही रहती है। और थोड़ी खुली खिड़की से छन कर इसकी मादक सुगंध कमरे को एक अद्भुत सुवास से भर भी दे रही है।

और बाहर चल रही हवा को क्या कहूँ? कह तो गये केदार नाथ अग्रवाल।

हवा हूँ, हवा मैं, बसंती हवा हूँ।
सुनो बात मेरी -अनोखी हवा हूँ

बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्तमौला
नहीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ।
जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ,
मुसाफिर अजब हूँ।

लेकिन वसंत के सौदर्य और उन्माद का जो वर्णन जयदेव कर गये, वह तो अभूतपूर्व है, और ऐसा शायद कोई कर भी ना पाए। अद्भुत  शब्द विन्यास, और अभियक्ति का ऐसा लालित्य,ऐसी कोमल कमनीयता तो केवल जयदेव की लेखनी से ही उद्भूत हो सकती है। 

ललितलवङगलतापरिशीलनकोमलमलयासमीरे।

मधुकर्णिकर्करम्बितकोकिलकुजितकुञ्जकुटिरे॥

विहारति हरिरिह सरस वसन्ते।

नृत्यति युवतिजनेन समं सखी विरहिजनस्य दूरन्ते॥

जयदेव का वसंत यौवन और शृंगार का वसंत है, प्रकृति के सौंदर्य और आह्लाद का वसंत है, प्रेम और और आकर्षण का वसंत है, जो कुंज और कुटीर दोनों को अद्भुत रूप से अभिषिक्त करता है। लेकिन इन ललित अभिव्यक्तियों  के पीछे एक सारगर्भित आध्यात्मिकता भी है, जो समझने वालों को खूब दिखती है। दुर्भाग्यवश, बहुतों के लिये लेकिन यह विशुद्ध शृंगार रस ही है।

आधुनिक हिन्दी के श्रेष्ठतम साहित्यकारों में एक हैं आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी। उनके गद्य में भी पद्य की लयात्मकता है, और संगीत की गूंज  भी। उन्हीं का का एक  प्रसिद्ध ललित निबंध है, ‘वसंत आ गया है’, उनके शांति निकेतन के प्रवास के दिनों का लिखा गया। उन्होंने वसंत में पलाश के दहकते रक्त वर्णी फूल तो देखे, लेकिन महुआ और जामुन को पुष्पित होने  की प्रतीक्षा करते भी देखा। और एक कचनार को फूलों से लदे देखा तो दूसरे को शुष्क और प्रभा विहीन। विष्णुकान्ता जैसी अदने से घास के नील में मेदुर वर्ण को वसंत के आवेश में उद्वेलित होते हुए भी देखा, । और कालिदास के लाड़ले कर्णिकार को  भी, जो  वसंत होते हुए भी वसंत की प्रतीक्षा किए जा रहा है, और फिर उन्होंने लिखा, ‘वसंत आता नहीं ले आया जाता है। जो चाहे और जब चाहे घर ले आ सकता है।‘ 

कितना सही।

आज फुलौरी दूज है। वसंत के अनेक मनमोहक परंपराओं को उल्लास से मानने की श्रृंखला का पहला उत्सव। और श्री राम कृष्ण परमहंस का जन्म दिन भी। लेकिन मेरा मन है जो थका भी है और अवसाद से भरा भी। ज्वर के ताप में मेरी सोच प्रक्रिया थोड़ी गड़बड़ा सी गई है। जीवन के उत्तरार्ध में, सात दशकों के पार, जीवन में सुंदरता की निरंतरता कैसे बनी रहे, और उसकी उद्देश्यपूर्णता भी, ईश्वर से इस पर बहस करने का मन करता है। इस बाधित और बेतुके वार्तालाप के बीच कब पलकें झपक गई, पता ही नहीं चला।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

Leave a comment