अगर फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे अज़ीम और श्रेष्ठ शायर की कलम से जो यह लिखवाये,
“वो कभी रंग वो कभी ख़ुशबू
गाह गुल गाह रात-रानी है।”
और, यह भी कि,
“दिन को सूरज-मुखी है वो नौ-गुल
रात को है वो रात-रानी भी।“
तो यह फूल तो कुछ विशेष ही अद्भुत और निश्चय ही अद्वितीय होगा।
तो कौन है यह फूल, और क्या ख़ास है इसमें और इसकी ख़ुशबू में? कौन है यह रात की रानी, कवियों और शायरों की नाज़ुक संवेदनशीलता और असाधारण रचनात्मकता को इस कदर प्रभावित करने वाली?
ऐसा फूल कोई साधारण फूल तो हो नहीं सकता जो फ़िराक़ साहेब और ना जाने कितने और उम्दा शायरों और श्रेष्ठ कवियों को इतना आकर्षित और प्रभावित करे कि उनकी कलम इसकी ख़ुशबू के क़सीदे लिखने से थके नहीं।

कैसी मादकता होगी इसकी सुगंध में कि जब ख़ुशबू की बात हो तो इसी के ख़ुशबू का ख़्याल आये,
“नवाह-ए-जाँ में भटकती हैं ख़ुशबुएँ जिस की
वो एक फूल कि लगता है रात-रानी है।“
और कैसी होगी यह ख़ुशबू, जिससे प्रियतमा की याद बेसाख़्ता आ जाये,
“उस वक़्त रात-रानी मिरे सूने सहन में
ख़ुशबू लुटा रही थी कि तुम याद आ गए।“
ज़ाहिर है कि इस फूल की ख़ुशबू यकीनन बहुत उन्मादक है, परंतु रूप? सुगंध जिसकी इतनी मादक है, रूप उसका उतना ही प्रशांति प्रदान करने वाला। छोटे-छोटे सुंदर स्निग्ध कमनीय फूल जो एक माला में पिरोए हुए से लगते हैं। यह कैसा विरोधाभाष है?

और वो कौन सा अभिशाप है कि जो इस फूल को रात में अद्भुत अतुलनीय सुगंध को फैलाने की सामर्थ्य देता है, दिन के उजाले में उसे बिलकुल ही निष्प्रभावी बना देता है, इसकी मादक सुगंध का अपहरण कर लेता है। रात में जो सुगंध इसे अपराजेय बना देता है, दिन की रोशनी इसे एक साधारण वनस्पति में परिवर्तित कर देती है। लोग कहते हैं कि कई जन्मों पूर्व यह एक अप्सरा थी, जिसकी एक भूल ने इसे अभिशप्त कर दिया। एक अभिशाप जो इसे रात के अंधेरे में तो पूर्ण सौंदर्य और आकर्षण से भर देता था, लेकिन दिन की पहली किरण के साथ ही, इसका सारा सम्मोहन तिरोहित हो जाता था। सम्मोहन और विमोहन का यह क्रम अभी भी अनवरत जारी है।
लेकिन विज्ञान कुछ और ही कहता है। ऐसी क्या वजह है कि ये भीनी भीनी खुशबु चारों ओर बिखेरने वाला फूल रात में ही खिलता है. फूल आधी रात चुपके से फूलता है.और फूलते ही झरने लगता है.

जो जीव रात में सक्रिय रहता हैं या हो जाते हैं, उन्हें हम सामान्य भाषा में निशाचर कहते हैं. इसी तरह कई पौधों के फूल भी केवल रात में ही खिलते हैं. ऐसे पौधों को रात में खिलने वाले पौधे कहते हैं. रात की रानी का पौधा ऐसा ही होता है. आमतौर पर जिन पौधों के फूल रात में खिलते हैं, उन फूलों में बहुत ही मनमोहक सुगंध होती है. इस सुगंध के कारण पतंगे (Moth) जैसे रात में सक्रिय जीव-जंतु इन पौधों की ओर आकर्षित हो जाते हैं. जब ये कीड़े फूल पर आकर बैठते हैं तो इनके पंखों से परागकण चिपक जाते हैं. जब कोई कीड़ा एक पौधे से दूसरे पौधे पर जाता है तो ये परागकण दूसरे फूल तक पहुंच जाते हैं. इस प्रकार परागसेचन (Pollination) की क्रिया संपन्न हो जाती है. इसलिए हम कह सकते हैं कि रात की रानी के फूल रात में उन कीड़ों को आकर्षित करने के लिए ही खिलते हैं, जो पराग-सेचन की क्रिया में सहायक होते हैं. फूलों से बने फल और फलों से प्राप्त बीजों से ही नए पौधों का जन्म होता है.
लेकिन कवियों को इन वैज्ञानिक स्पष्टीकरणों से क्या लेना देना? उनके लिए तो रात रानी दिन में इसलिए नहीं खिलती क्यों कि जिस कमनीयता का अवलंब चंद्रमा का शीतल स्निग्ध स्पर्श है, वह सूरज की तल्ख़ रोशनी में कैसे खिले?
“चाँद की आग़ोश में होने से जिस का है वजूद
खिल सकेगी क्या भला वो रात-रानी धूप में।“
इसके श्वेत वर्ण होने के पीछे भी वैज्ञानिक एक कारण बताते हैं। रात में खिलने वाले फूल सफेद रंग के ही होते हैं। इन फूलों का रंग बहुत चमकीला नहीं होता क्योंकि चमकीले लाल, गुलाबी, पीले रंग रात्रि के अंधेरे में दिखाई नहीं देते. इसलिए कीड़ों को आकर्षित करने में इनके रंगों का कोई अधिक महत्व नहीं होता. रात्रि में खिलने वाले अधिकतर फूलों का रंग सफेद ही होता है क्योंकि सफेद रंग रात्रि के अंधरे में भी साफ साफ नजर आता है या चमकता है तो कीड़ों को आकर्षित करता है.

लेकिन वैज्ञानिक जो कहें, सौंदर्य प्रेमियों और रसिकों के लिए इसके फूलों की सौम्य धवल छवि उतनी ही मनमोहक है जैसी चटकीले चमकीले रंग बिरंगे फूलों की होती है।
रात में अपनी मनमोहक सुगंध से तन-मन को खुश कर देने वाले इस फूल को दुनिया भर में अनेक नामो से जाना जाता है जैसे, हस्नुहाना, नाइट जैस्मीन, लेडी ऑफ द नाइट, नाइट जैस्मीन, नाइट-ब्लूमिंग जैस्मीन, पॉइज़नबेरी, दामा डे नोचे, गैलन डे नोचे, नाइट ब्लूमिंग सेस्ट्रम, नाइट क़्वीन, क़्वीन ऑफ़ द नाइट आदि। लेकिन अमूमन इसे लोग नाईट जैस्मिन भी कहते हैं, रात की चमेली।
वनस्पति शास्त्र इसे सोलनेसी (Solanaceae) कुल में वर्गीकृत करता है और इसका वैज्ञानिक नाम है Cestrum nocturnum। दक्षिण एशिया और वेस्ट इंडीज में इसकी पैदाइश हुई है। रात रानी का पौधा झाड़ी नुमा होता है। विशेष रूप से यह भारत, बांग्लादेश, वेस्ट इंडीज़ और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशो के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रो में एक सदाबहार झाड़ी के रूप में पाया जाता है। इसलिए हिंदुस्तान पर इसका पैदाइशी हक़ है, और यहाँ की संस्कृति का यह एक अत्यंत सुरभिमय और मनमोहक प्रतिबिंब है, और एक बेहद खूबसूरत ख़ुशबू वाला प्रतिनिधि भी।
लेकिन यह समझना और जानना आवश्यक है कि जिस रात रानी की चर्चा यहाँ हो रही है, इसी नाम से कुछ संदर्भों में पारिजात या हरसिंगार के फूल भी जाने जाते हैं। लेकिन पारिजात और रात रानी बिलकुल अलग हैं। और यद्यपि दोनों की ख़ासियत उनकी अद्भुत ख़ुशबू है, दोनों अपनी अपनी अलग विशेषताएँ रखते हैं। पारिजात पर ऐसा ही एक आलेख शायद उसकी महत्ता को श्रेष्ठतर तरीक़े से उद्घाटित कर सकेगा।
रात की रानी फूलों से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं हैं. भारतीय पौराणिक कथाओं में इसे पारिजात के पेड़ से जोड़ा जाता है. कहा जाता है कि यह फूल स्वर्ग की देवी, उर्वशी द्वारा धरती पर लाया गया. एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने इस फूल को अपनी प्रेमिका राधा को भेंट किया था, जिससे यह प्रेम और सुंदरता का प्रतीक बन गया. शायद यही कारण है कि पूर्ण चंद्र की रात इसका निखार उत्कर्ष पर होता है, ऐसी रातों को जब कृष्ण राधा के साथ रास करते थे। और अमावस्या की रात यह खिलता ही नहीं, उस वियोग के अनुभव में जो राधा कृष्ण के लिये करती होंगी।

और प्रेमी प्रेमिकाओं के उलाहना में भी रात रानी जिस ख़ूबसूरती से अभिव्यक्त हुई है, वह भी लाजबाब है। सुनिए उलाहना में प्रेमिका क्या कहती है,
“अमावस न पूनम से मुझ को ग़रज़ है
महकती हुई रात-रानी नहीं हूँ।“
कहते हैं कि कामदेव के अचूक बाण आम्र की मादक मंजरियाँ हैं। रात रानी के फूल शायद दिन में भी उतने ही वशीभूत करने वाले होते जैसा वे रात में होते हैं, तो निश्चय ही कामदेव के बाणों की संरचना रात रानी के श्वेत स्निग्ध सुवासित मंजरिओं के गुँथे हुए पुष्प होते, जिनका नाम मात्र का स्पर्श ही मनुष्य को कामदेव के वश में अनायास ही कर देता।