
मेरी बालकनी के सामने की नाज़ुक सी बेल में कल एक बेहद खूबसूरत और बहुत ही चमकदार नीला फूल खिला है। अकेला है लेकिन अकेले ही मन मोह लेने वाला है। ऐसा सौंदर्य, ऐसी कमनीयता, ऐसी सुकुमारता , और ऐसा सौष्ठव कि नज़र उस से हटने को तैयार नहीं।
और इसका नीला रंग तो ऐसा मनभावन है कि वर्णन करते नहीं बनता। भगवान कृष्ण का श्याम वर्ण शायद ऐसा ही होगा जिसका आकर्षण अतुलनीय कहा जाता है। क्या छवि उनके स्वरूप की होगी, जब इस छोटे से फूल से आँखें हटाने का मन नहीं कर रहा?
कमनीय लता
अपराजिता की लता होती है। ईश्वर ने अपनी इस उत्कृष्ट कृति को क्यों इतना नाज़ुक बनाया कि उसे सहारे की आवश्यकता पड़े? यह विचारणीय है। संभवतः इसलिए कि विशेष रूप से भाग्यशाली किसी किसी को ही इस अतुलनीय सुकुमारता और सौंदर्य को प्रकट करने में सहयोग का अवसर मिले सके। लेकिन अपराजिता ऐसी लता है जो केवल सहारे के लिए साथी का हाथ थामती है, उस पर लद नहीं जाती। लताएँ तो ऐसी भी देखी जाती हैं जो अपने संबल का अस्तित्व ही विपोपित कर डालती हैं। लेकिन अपराजिता अलग है, रूप में, और गुण में भी । वैसे तो यह छरहरी, इकहरी और सुंदर काया की स्वामिनी है, लेकिन कभी-कभी इसे अपना विस्तारित स्वरूप प्रदर्शित करने की इच्छा होती है, और तब यह दुहरी हो जाती है। इसके फूल भी दो तरह के होते हैं – नीले और सफेद। लेकिन पत्ते इसके सदैव हरे ही होते है, स्निग्ध, आगे से चौड़े और पीछे से थोड़े संकुचित। इनका गहरा हरापन इसके फूलों की चमक, रंग और कमनीयता को द्विगुणित कर देता है।

जहां तक मैं जानता हूँ अपराजिता हमेशा बेल के रूप में ही दिखती है, नाज़ुक और सुंदर। और एक ऐसी रूपवती कन्या की तरह, जिसका सौंदर्य किसी के सहारे खड़े होने से और निखर उठता है। किसी और स्वरूप में इसकी कल्पना कर पाना थोड़ा मुश्किल लगता है। बेलें तो अनेक हैं, विस्तृत और विशालकाय भी। कई ऐसी जो उसको जिसने उन्हें सहारा दिया है, उसे पूरी तरह से आच्छादित और पराजित कर दें। लेकिन कवियों और सौंदर्य- प्रेमियों की कल्पना की बेल तो अपराजिता ही हो सकती है। कमनीय, सुघड़, मन को अद्भुत आनंद से प्रफुल्लित करने वाली।

विभिन्न नाम
अपराजिता के अंग्रेज़ी नाम अनेक हैं। Asian pigeonwings, Bluebellvine, Blue pea, Butterfly pea, Cordofan pea, और Darwin pea, इसके कुछ प्रचलित नाम हैं। वैज्ञानिक नाम इसका Clitoria ternatea है, और वनस्पति विज्ञान की दुनिया की Fabaceae परिवार की यह सुंदरतम सदस्यों में से एक है। कहते है कि इस सुंदर फूल की जन्म स्थली इंडोनेशिया देश है। वहाँ के एक द्वीप समूह मलूका के उत्तर भाग में स्थित एक द्वीप Ternate के नाम पर इस फूल का नाम पड़ा। लेकिन आज यह विश्व के अनेक स्थानों पर पाया जाता है।
हमारे देश में इसे अपराजिता कहते है। अपराजिता नाम किसने दिया, यह तो ज्ञात नहीं है लेकिन जिस किसी ने यह नाम दिया है, निश्चय ही वह सौंदर्य -प्रिय और उत्कृष्ट सुरुचि का स्वामी होगा।
अद्भुत सौंदर्य-स्त्रीत्व का प्रतीक

अपराजिता के फूलों की बनावट विशिष्ट है। शंकु के आकार वाले जो भीतर की तरफ़ संकुचित हो जाते है। गहरे नीले रंग की पंखुड़ियों के मध्य कभी-कभी भीतर की और एक हल्के पीत वर्ण का वृत्त भी दिखता है जो इसके सौंदर्य को द्विगुणित कर देता है। सामने और इसके पृष्ठ भाग पर सुंदर हल्की धारियाँ इसके नील वर्ण को अतिरिक्त द्युति प्रदान करते हैं और इसके स्पर्श को देते है विशेष कोमलता।
यह फूल कई अर्थों में स्त्रीत्व का प्रतीक माना जाता है। न केवल अपने रूप और कोमलता के कारण बल्कि अपनी बनावट के कारण भी। वस्तुतः इसका अंग्रेज़ी नाम Clitoria ternatea का नामकरण इसी कारण से हुआ। इसलिए अपराजिता का फूल स्त्री जाति के हर रचनात्त्मक और आकर्षक स्वरूप, नैसर्गिक कोमलता, और मनमोहने वाली प्रवृतिओं का प्रतिबिंब भी है और पर्याय भी।
सर्वगुणसम्पन्न
अपराजिता को ईश्वर ने यदि अद्भुत सौंदर्य और आकर्षण दिया है तो अनेक गुणों से भी अलंकृत किया है। रंग विज्ञान में इसका विशेष स्थान है, और बहुत खास तरह के नीले रंग को बनाने में इसका उपयोग होता है। दक्षिण पूर्व के देशों में अनेक व्यंजनों को बनाने में इसका प्रयोग होता है और पाक कला में इसे एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए प्रयुक्त किया जाता है। बर्मी और थाई व्यंजनों में ,इसके फूलों को मक्खन में डुबोकर तला भी जाता है। इसके फूलों और सूखे लेमनग्रास की मिला कर एक ख़ास क़िस्म की चाय बनाई जाती है। वैसे तो यह चाय स्वतः ही रंगीन होती है, लेकिन तरह तरह के अन्य पदार्थ मिला कर इसे विशेष रंग दिया जाता है, मसलन नींबू का रस इसे बैंगनी रंग में बदल देता है।इस चाय को थाइलैंड और वियतनाम में आमतौर पर अम्लता बढ़ाने और पेय को गुलाबी-बैंगनी रंग देने के लिए शहद और नींबू के साथ मिलाया जाता है, जो आमतौर पर रात के खाने के बाद या होटल और स्पा में जलपान के रूप में परोसा जाता है। यह पेय एक विशिष्ट स्थानीय पेय है जैसे कैमोमाइल चाय दुनिया के अन्य हिस्सों में है।
आयुर्वेद में इसके प्रयोग अनेक हैं। इसके अर्क औषधीय गुणों का भंडार है जिसमें रोगाणुरोधी, ज्वरनाशक, सूजनरोधी, दर्दनिवारक, मूत्रवर्धक, स्थानीय संवेदनाहारी, मधुमेहरोधी इत्यादि गुण शामिल हैं। इस पौधे का कई बीमारियों के लिए पारंपरिक आयुर्वेदिक चिकित्सा में लंबे समय से उपयोग किया जाता रहा है और वैज्ञानिक अध्ययनों ने आधुनिक प्रासंगिकता के साथ उनकी पुष्टि भी की है।
देवताओं की प्रिय

लेकिन सौंदर्य यदि इसकी विशेषता है, इसके आगणित गुण इसके आकर्षण, तो शुचिता इसका स्वभाव है । इसलिए पूजा के लिए इसके फूलों का उपयोग प्रचलित भी है और अत्यधिक वांछित भी। यह शंकर और विष्णु को एक जैसा ही प्रिय है। इसका उपयोग काली पूजा और नवदुर्गा पूजा में विशेषरूप में किया जाता है। जहां काली का स्थान बनाया जाता है वहां पर इसकी बेल को जरूर लगाया जाता है।
शायद यह इसकी देवताओं के प्रति समर्पण का ही प्रभाव है कि गर्मी के कुछ समय के अलावा हर समय इसकी बेल फूलों से सुसज्जित रहती है।
सौंदर्य की इस अप्रतिम देवी को अपराजिता इसलिए कहते हैं क्योंकि अपने रूप, रंग, सौष्ठव, कोमलता, कमनीयता और आकर्षण में यह अतुलनीय है, किसी से कभी भी पराजित नहीं होने वाली।